दिन द्वै तें बधू यह यों है सुनो, रहे अंग अगौछि सजोहैं किये।चपलोहैं न पाँइ परै कितहूँ, गुड़ियान के खेलन जो हैं किये।कवि ‘ग्वाल’ मिलोहैं सखी गन सों, सिसुता के सुहाँस भजोहैं किये।उचकोहैं उरोज तकै पट में, दृग कों तिरछोहैं लजोहैं किये॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+