विधि को सिर पंचम खंड भयो मुनि नारद नाचे कपि मुख लेते।शिव भीलिनी के बस होइ भ्रमे सुरराज के जिह्न भये तन जेते॥उद्धव रावरे नेक सखा सम देखैं है धोक ग्वालिनि देते।एक ही भोग के आसन पै झख मारत जोग के आसन केते॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+