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और विष जेते तेते प्राण के हरैया होत

कवित्त · लगभग २ मिनट
और विष जेते तेते प्राण के हरैया होत,वंशी के कढ़े की कभू जात न लहर है।सुनते ही एक संग रोम-रोम रचि जाय,जीय जारि डार पारै बेकली कहर है॥‘ग्वाल’ कवि लाल! तो सौं जोरि कर पूछत हौं,साँच कहि दीज्यो जो पै मो पर महर है।बाँस में कि वेध में कि होठ में कि फूंक में कि,आँगुरी की दाब में कि धुनि में ज़हर है॥

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