कुंज बिहरत स्याम कुंवरि वृषभानुजा,प्रेम पुलकित अंग राग-रागी।तन पुलक, मन पुलक, जोरि उर सौं उरहिं,रहत लपटाइ दोऊ भाग भागी॥कुसुम-सैया रचित, विविध सुमननि खचित,भये आरुढ़ अति प्रेम पागी।छीतस्वामी चतुर, चतुरवर नागरी,गिरिधरन चूमि वर कंठ लागी॥

कुंज बिहरत स्याम कुंवरि वृषभानुजा
छीतस्वामीपद · लगभग २ मिनट