पुनः चतुर्विध नायक · क्रिया-चतुर नायक खेलत जानिसि टोलिआ, नन्द किसोर।छुइ बृषभानु-कुँअरिआ, होइगो चोर॥११२॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
चूल्हा दीन्हो बारि, नातो रह्यो सो जरि गयोरहीमकविताचूल्हा दीन्हो बारि, नातो रह्यो सो जरि गयोरहीम२ मिनट का पाठ