भव निधि तरनतारन चिंतामनि इक निमिष इहु मन लागा॥गोबिंद हम ऐसे अपराधी।जिन प्रभु जीउ पिंड था दीया तिसकी भाव भगति नहिं साधी।परधन परतन परतिय निंद्रा पर अपवाद न छूटै॥आवागमन होत है फुनि फुनि इहु पर संग न छूटै॥जिह घर कथा होत हरि संतन इक निमष न कीनो मैं फेरा॥लंपट चोर धूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा॥दया धर्म औ गुरु की सेवा ए सुपनंतरि नाहीं॥दीन दयाल कृपाल दमोदर भगति बछल भैहारी॥कहत कबीर भीर जनि राखहु हरि सेवा करौं तुमारी॥50॥

