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ल्याई श्यामसुंदरै छबीली

कवित्त · लगभग २ मिनट
ल्याई श्यामसुंदरै छबीली ब्रजबाम छलि,ठाढ़ी जहाँ पौर वृषभान की किसोरी है।बोल उठि नारी किलकारी गारी तारी दै कै,आयो यह आयो अरी छाछ निज चोरी है॥ग्वाल कवि कोऊ गुलचावै औ रचावै रंग,अंगन चलावै औ नचावै डारि रोरी है।केती कहैं गोरी बरजोरी को न मानो बुरो,होहो लाल होरी लाल होरी लाल होरी है॥

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