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हाशिया
कविता
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोइ
रहीम
दोहा · लगभग २ मिनट
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोइ।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होइ॥९०॥
॥
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दिव्य दीनता के रसहिं, का जानै जग अन्धु
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दुख नर सुनि हाँसी करैं, धरैं रहीम न धीर
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