ताप मध्य में ताप हूँ, ना मैं ताप अताप।जाप मध्य में जाप हूँ, ना मैं जाप अजाप॥ना मैं जाप अजाप, आप को आप प्रकाशक।सूक्ष्म स्थूल प्रपंच सर्व को इक रस भासक।कह गिरिधर कविराय, पाप में पाप अपाप।जा में जिय अरात अष्ट ज्वर जो हैं ताप॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+