प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूरसहजोबाईकविताप्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर
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१९ रचनाएँ

प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूरसहजोबाईकविता
प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यानसहजोबाईकविता
अड़सठ तीरथ गुरु चरण, परवी होत अखंडसहजोबाईकविता
गुरुवचन हिय ले धरो, ज्यों कृपणन के दामसहजोबाईकविता
मन में तो आनंद है, तनु बौरा सबअंगसहजोबाईकविता
जो आवै सत्संग में, जात वर्ण कुलखोयसहजोबाईकविता
सब तीरथ गुरु के चरन, नितही परवी होयसहजोबाईकविता
साधु मिले गुरुपाइयां, मिट गये सब संदेहसहजोबाईकविता
हरि किरपा जो होइतो, नाहिं होइतो नाहिंसहजोबाईकविता
सहजो संगति साधु की, छूटे सकल वियाधसहजोबाईकविता
सहजा साधन के मिले, मन भयो हरि के रूपसहजोबाईकविता
मैं तो खेलूं प्रभु के संगसहजोबाईकविता
साधो भवसागरमें काल, होरी खेलईसहजोबाईकविता
गोविंद के गुण क्यों नहिं गावोसहजोबाईकविता
हमारे गुरु पूरण दातारासहजोबाईकविता
अब तुम हमारी ओर निहारोसहजोबाईकविता
हरि हरि जप लेनी औसर बीतो जायसहजोबाईकविता
ऐसो बसंत नहीं बारबारसहजोबाईकविता
अंत जु आए जगत् मेंसहजोबाईकविता