बुलावति जसुदा तोतरे बोल।अपने सुत की करत प्रसंसा, दुहुँ कर परसि कपोल॥कर अँगुरी गहि निरखि नचावति, आनंद हृदै अतोल।अपुनौ जनम सुफल करि मानति, दृग सिर मुदित अडोल॥कबहूँक लै हिरदै सों चाँपत, चुंबन देत तमोल।‘रसिक सिरोमनि’ धन ब्रजभूषन, बालक अँग-अँग लोल॥

बुलावति जसुदा तोतरे बोल
गोस्वामी हरिरायपद · लगभग २ मिनट