छाँड़ों मेरे ललन! ललित लरिकाईतुलसीदासकविताछाँड़ों मेरे ललन! ललित लरिकाई
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छाँड़ों मेरे ललन! ललित लरिकाईतुलसीदासकविता
हरि को ललित बदन निहारु निपट हीं डाँटति निठुर ज्यों लकुट कर तें डारुतुलसीदासकविता
लेत भरि भरि नीर कान्ह कमल नैनतुलसीदासकविता
हाहा री महरि! बारो, कहा रिसबस भईतुलसीदासकविता
ललित लालन निहारि, महरि मन बिचारितुलसीदासकविता
ब्रज पर घन घमंड करि आएतुलसीदासकविता
टेरीं कान्ह गोबर्धन चढ़ि गैयातुलसीदासकविता
गावत गोपाल लाल नीकें राग नट हैंतुलसीदासकविता
देखु सखी हरि बदन इंदु परतुलसीदासकविता
आजु उनीदे आए मुरारीतुलसीदासकविता
गोपाल गोकुल बल्लवी प्रिय गोप गोसुत बल्लभंतुलसीदासकविता
बिछुरत श्रीब्रजराज आजु इन नयनन की परतीति गईतुलसीदासकविता
नहिं कछु दोष स्याम को माई!तुलसीदासकविता
करि है हरि बालक की सी केलितुलसीदासकविता
आलि! अब कहुँ जनि नेह निहारितुलसीदासकविता
लागियै रहति नयननि आगे तें न टरति मोहन मूरतितुलसीदासकविता
जब ते ब्रज तजि गये कन्हाईतुलसीदासकविता
ससि तें सीतल मोकौं लागै माई री! तरनितुलसीदासकविता
संतत दुखद सखी! रजनीकरतुलसीदासकविता
कोउ सखि नई बात सुनि आईतुलसीदासकविता
ऊधो! या ब्रज की दसा बिचारौतुलसीदासकविता
मधुकर! कहहु कहन जो पारौतुलसीदासकविता
ऊधो जू कह्यो तिहारोइ कीबोतुलसीदासकविता
सो कहौ मधुप! जे मोहन कहि पठईतुलसीदासकविता
मेरे जान और कछु न मन गुनिएतुलसीदासकविता
भली कही, आली हमहुँ पहिचानेतुलसीदासकविता
जो पै अलि! अंत इहै करिबो होतुलसीदासकविता
ऊधो! यह ह्याँ न कछू कहिबे हीतुलसीदासकविता
मधुकर! कान्ह कही ते न होहीतुलसीदासकविता
मधुप! तुम्ह कान्ह ही की कही क्यों न कही है?तुलसीदासकविता
दीन्हीं हैं मधुप सबहि सिख नीकीतुलसीदासकविता
ताकी सिख ब्रज न सुनैगो कोउ भोरेंतुलसीदासकविता
आली! अति अनुचित, उतरु न दीजैतुलसीदासकविता
ऊधो हैं बड़े, कहैं सोइ कीजैतुलसीदासकविता
कान्ह, अलि, भए नए गुरु ग्यानीतुलसीदासकविता
सब मिलि साहस करिय सयानीतुलसीदासकविता