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हाशिया
कविता
जलचर थलचर ब्योमचर, गनै कहाँ लौ कोइ
सुंदरदास
दोहा · लगभग २ मिनट
जलचर थलचर ब्योमचर, गनै कहाँ लौ कोइ।
सुन्दर जैसौ घट जहाँ, रह्यौ तिसौही होइ॥
॥
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तृष्णा पेट पसारियौ, तृप्ति न क्यौं ही होइ
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पावस नृप चढि आइयौ, साजि कटक मम गेह
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