इक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहैरहीमकविताइक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहै
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११ रचनाएँ

इक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहैरहीमकविता
ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्योंरहीमकविता
गई आगि उर लाय, आगि लैन आई जु तियरहीमकविता
चूल्हा दीन्हो बारि, नातो रह्यो सो जरि गयोरहीमकविता
दीपक हिए छिपाइ, नवल बधू घर लै चलीरहीमकविता
पलटि चली मुसकाइ, द्युति रहीम उपजाइ अतिरहीमकविता
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीमकविता
रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहींरहीमकविता
रहिमन जग की रीति, मैं देखा रस ऊख मैंरहीमकविता
रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीजै नहींरहीमकविता
रहिमन पुतरी स्याम, मनौ जलज मधुकर लसैरहीमकविता