जो पग धरत सो दृढ़ धरत, पग पाछे नहिं देतदयाबाईकविताजो पग धरत सो दृढ़ धरत, पग पाछे नहिं देत
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६६ रचनाएँ

जो पग धरत सो दृढ़ धरत, पग पाछे नहिं देतदयाबाईकविता
कायर कँपै देख करि, साधू को संग्रामदयाबाईकविता
मनमोहन को ध्याइये, तन-मन करि ये प्रीतदयाबाईकविता
आप मरन भय दूर करि, मारत रिपु को जायदयाबाईकविता
सूरा सन्मुख समर में, घायल होत निसंकदयाबाईकविता
‘दया’ दास हरि नाम लै, या जग में ये सारदयाबाईकविता
‘दया’ सुपन संसार में, ना पचि मरिये बीरदयाबाईकविता
अर्ध नाम के लेत ही, उधरे पतित अपारदयाबाईकविता
असु गज अरु कंचन ‘दया’, जोरे लाख करोरदयाबाईकविता
ब्रह्म रूप सागर सुधा, गहिरो अति गंभीरदयाबाईकविता
नित प्रति वंदन कीजिये, गुरु कूँ सीस नवायदयाबाईकविता
साधू सिंह समान है, गरजत अनुभव ज्ञानदयाबाईकविता
‘दया’ प्रेम उनमत जे, तन की तनि सुधि नाहिंदयाबाईकविता
कोटि लक्ष व्रत नेम तिथि, साध संग में होयदयाबाईकविता
भाई बंधु कुटुंब सब, भये इकट्ठे आयदयाबाईकविता
राम टेक से टरत नहिं, आन भाव नहिं होतदयाबाईकविता
जे जन हरि सुमिरन बिमुख, तासूँ मुखहुँ न बोलदयाबाईकविता
श्री गुरदेव दया करी, मैं पायो हरि नामदयाबाईकविता
या जग में कोउ है नहीं, गुरु सम दीन दयालदयाबाईकविता
चरनदास गुरुदेव ने, मो सूँ कह्यो उचारदयाबाईकविता
जैसो मोती ओस को, तैसो यह संसारदयाबाईकविता
तात मात तुम्हरे गये, तुम भी भये तैयारदयाबाईकविता
राम कहो फिर राम कहु, राम नाम मुख गावदयाबाईकविता
साध संग जग में बड़ो, जो करि जानै कोयदयाबाईकविता
बंदौ श्री सुकदेव जी, सब बिधि करो सहायदयाबाईकविता
कहूँ धरत पग परत कहुँ, डिगमिगात सब देहदयाबाईकविता
दया दान अरु दीनता, दीनानाथ दयालदयाबाईकविता
‘दया कुँवर’ या जक्त में, नहीं रह्यो थिर कोयदयाबाईकविता
सतगुर सम कोउ है नहीं, या जग में दातारदयाबाईकविता
गुरु किरपा बिन होत नहिं, भक्ति भाव बिस्तारदयाबाईकविता
जे गुरु कूँ वंदन करै, दया प्रीति के भावदयाबाईकविता
रावन कुंभकरण गये, दुरजोधन बलवंतदयाबाईकविता
बिरह ज्वाल उपजी हिये, राम-सनेही आयदयाबाईकविता
प्रेम मगन जे साधवा, बिचरत रहत निसंकदयाबाईकविता
मनसा बाचा करि दया, गुरु चरनों चित लावदयाबाईकविता
प्रेम-पीर अतिही बिकल, कल न परत दिन रैनदयाबाईकविता