सतगुरु लई कमांण करि, बांहण लागा तीरकबीरकवितासतगुरु लई कमांण करि, बांहण लागा तीर
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सतगुरु लई कमांण करि, बांहण लागा तीरकबीरकविता
सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दातिकबीरकविता
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एककबीरकविता
सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंगकबीरकविता
सब आसण आसा तणाँ, निवर्ति कै को नाहिंकबीरकविता
सबकूॅ बूझत मैं फिरौं, रहण कहै नहीं कोइकबीरकविता
सातों शब्द जु बाजते, घरि घरि होते रागकबीरकविता
साषित सण का जेवड़ा, भीगाँ सूॅ कठठाइकबीरकविता
सिबसकती दिसि कौण जु जोवै, पछिम दिसा उठै धूरिकबीरकविता
सुखिया सब संसार है, खावै अरू सोवैकबीरकविता
सुर नर था के मुनि जनाँ, जहाँ न कोइ जाइकबीरकविता
सुरति ठीकुली लेज ल्यो,मन् नित डोलनहारकबीरकविता
स्वामी हुवासीत का, पैकाकार पचासकबीरकविता
स्वामी हूॅणाॅ सोहरा, दोद्धा हूॅणाँ दासकबीरकविता
हँसै न बोलै उन्मनी चंचल मेहल्या मारिकबीरकविता
हदे छाँडि बेहदि गया,हुआ निरंतर बासकबीरकविता
हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमारकबीरकविता
हरि संगति सीतल भया, मिटी मोह की तापकबीरकविता
हाँसी खेलौं हरि मिलै, कारण सहै परसानकबीरकविता
हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी; केस जलै ज्यूँ घासकबीरकविता
हिरदा भीतरि आरसी, मुख देषणां न जाइकबीरकविता
हिरदा भीतरि दौं बलैं, घूँवा न प्रकट होइकबीरकविता
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराइकबीरकविता
हौं विरहा की लाकड़ी, समझि समभि धूँधाऊँकबीरकविता