मुग्धा तन त्रिबली बनी, रोमावलि के संगजसवंत सिंहकवितामुग्धा तन त्रिबली बनी, रोमावलि के संग
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जसवंत सिंह · चयनित काव्य से इस डिजिटल संकलन में उपलब्ध रचनाएँ। सूची को मूल पुस्तक की संपूर्ण विषय-सूची न मानें।
३१ रचनाएँ

मुग्धा तन त्रिबली बनी, रोमावलि के संगजसवंत सिंहकविता
कुंभ उच्च कुच सिव बने, मुक्तमाल सिर गंगजसवंत सिंहकविता
मुक्तमाल हिय स्याम कैं, देखी भावत नेनजसवंत सिंहकविता
पिक कुहुकै चातक रटै, प्रगटै दामिनि जोतजसवंत सिंहकविता
सुधा भरयो ससि सब कहैं, नई रीति यह आहिजसवंत सिंहकविता
जल सूकै पुहमी जरै, निसि यामें कृस होतजसवंत सिंहकविता
पुहमि बियोगिनि मेह की, धौरी पीरी जोतजसवंत सिंहकविता
आसव की यह रीति है, पीयत देत छकाइजसवंत सिंहकविता
रबि दरसै पंकज खुलै, उड़ै भौंर इकबारजसवंत सिंहकविता
जिहिं कीनो परपंच सबजसवंत सिंहकविता
बिस्ब कौ कारन बिस्ब कौ पोषकजसवंत सिंहकविता
सबै गति ओर चलै न हलै बिभुजसवंत सिंहकविता
गम्य अगम्य असंखि अचित उपाधिजसवंत सिंहकविता
लच्छ अलच्छ अभोगता भोग कौजसवंत सिंहकविता
एक अनेक सदा है समान है थूल हैजसवंत सिंहकविता
परै सब के न कछू पर वाकैं उरैजसवंत सिंहकविता
सत चिदानंद ताकी इछ्या ही कौं ईस जानिजसवंत सिंहकविता
बहुर्यौ कहत गुरु सिष्य यह ऐसैं जानिजसवंत सिंहकविता
अब सुनि मेरे मन आवत है सोई कहौंजसवंत सिंहकविता
तौब वह ग्यान कछु काच कौ धरम नाँहीजसवंत सिंहकविता
जैसै मृगत्रिष्णा विषै जल की प्रतीतजसवंत सिंहकविता
और यह ऐसैं जानि ग्यान जो पदारथ हैजसवंत सिंहकविता
फेरि हूँ जौ ऐसै कहौ इच्छा हू तो मानत हौजसवंत सिंहकविता
देह नाहीं इंद्री मन नाहीं नाहीं बुधि नाहींजसवंत सिंहकविता
नाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति हैजसवंत सिंहकविता
और ए व्यौहार बिषै बिंब प्रतिबिंब जे हैंजसवंत सिंहकविता
अंत समै नीकैं करि बिचारै तें जान्यौ जातजसवंत सिंहकविता
और सुनि सरीर कै बिषै चेष्टा जेतो कछुजसवंत सिंहकविता
सास्त्र मैं तो सब ठौर कह्यौ है अबिद्या बिषेंजसवंत सिंहकविता
ऐसै जो तूँ जानै जो अबिद्या बिस्वकारन हैजसवंत सिंहकविता
ब्रह्म प्रतिबिंब होत ईश्वर ह्वै देखौ याहिजसवंत सिंहकविता