देखिहौं, इन नैननिकुंभनदासकवितादेखिहौं, इन नैननि
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४७ रचनाएँ

देखिहौं, इन नैननिकुंभनदासकविता
केते दिन जु गये बिनु देखैंकुंभनदासकविता
तुम नीके दुहि जानत गैयाकुंभनदासकविता
गाय खिलावत श्याम सुजानकुंभनदासकविता
जो पै चोंप मिलनकी होयकुंभनदासकविता
बृज पर नीकी आज घटाकुंभनदासकविता
सुघर बना संग जागीकुंभनदासकविता
जयति-जयति श्रीहरिदास वर्य धरनेकुंभनदासकविता
राधे जु शोभा प्रगट भईकुंभनदासकविता
सारी मेरी भीजत है जु नईकुंभनदासकविता
सुन सखी निठुर पप्पैया बोलेकुंभनदासकविता
देखत स्याम-सरूप सखी रीकुंभनदासकविता
सिर परी ठगौरी सैन कीकुंभनदासकविता
आये माई वरषा के अगवानीकुंभनदासकविता
कबहू देख हौं इन नैननुकुंभनदासकविता
बरनों श्रीबल्लभ अवतारकुंभनदासकविता
राखी बांधति है नंदरानीकुंभनदासकविता
आवत ही जु करी चतुराईकुंभनदासकविता
चितवत नेकु कहा व्है जातकुंभनदासकविता
ग्वालिनि! तै मेरी गेंद चुराईकुंभनदासकविता
संतन को कहा सीकरी कामकुंभनदासकविता
हिलगनि कठिन है या मन कीकुंभनदासकविता
आवत मोहन मन जु हर्यो हैकुंभनदासकविता
सखी तेरे तन की सुंदरताकुंभनदासकविता
नैन भरि देख्यौ नंदकुमारकुंभनदासकविता
रास विलास रस भरे नर्ततकुंभनदासकविता
बनी राधा गिरधर की जोरीकुंभनदासकविता
राधे जू सोभा प्रगट भईकुंभनदासकविता
रस में रहत गड़ी हों रसिकनीकुंभनदासकविता
यमुना पर तन मन प्राण वारोंकुंभनदासकविता
पौढ़े हरि राधिका के भवनकुंभनदासकविता
पलना झूलत गिरिधरलालकुंभनदासकविता
ब्रज पर स्याम घटा झर लाईकुंभनदासकविता
गुमानी घन! काहे न बरसत पानीकुंभनदासकविता
अब दिन रात्रि पहार से भयेकुंभनदासकविता
माई हों गिरिधर गुण गाउंकुंभनदासकविता